वेदांत की श्वास में लिखा संविधान (एक आध्यात्मिक–संवैधानिक स्तुति)

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जब प्रातः की पहली रश्मि
ऋषियों के एकांत में उगती थी,
तब शब्द नहीं —
बोध जन्म लेता था।

वेदांत ने तब कहा था—
मनुष्य देह नहीं,
अनुभव की अनंत धारा है,
जिसका केंद्र स्वयं में स्थित—
अदृश्य, अविनाशी, और निर्विकल्प।

उसी सत्य ने वर्षों बाद
कलम का रूप धरा—
और संविधान की पंक्तियों में पुनः बोला—
कि मनुष्य किसी सत्ता का दास नहीं,
बल्कि स्वयं सत्ता का उद्गम है।

वेदांत ने फुसफुसाकर बताया—
“ईश्वर प्रत्येक प्राणी में निहित है।”
संविधान ने उसी को
अधिकारों की भाषा में अंकित किया—
कि किसी को भी
जाति, धर्म, भाषा, रूप या जन्म
मनुष्य होने से कम नहीं कर सकते।

जहाँ वेदांत ने कहा—
“जो स्वयं को जान लेता है वह जगत को जान लेता है,”
संविधान ने समय के समक्ष प्रतिज्ञा की—
कि ज्ञान, विचार, अभिव्यक्ति
मानव की नैसर्गिक अग्नि है,
जिसे बुझाने का हक किसी को नहीं।

वेदांत का वाक्य था—
“एकमेव अद्वितीयम्”
सब एक हैं, कोई दूसरा नहीं।
संविधान ने उसे लौकिक रूप दिया—
सेक्युलर भारत के रूप में,
जहाँ विविधता विवाद नहीं—
उपासना का विस्तार है।

वेदांत की आत्मा थी–
मौन, शांति, धैर्य और सत्य।
संविधान ने वही आत्मा
न्याय, समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के
चार स्तंभों के रूप में है,
जैसे सूक्ष्म दर्शन
लोकतंत्र के शरीर में रक्त बन कर बहा।

भारत आज आधुनिक है।
पर उसकी चेतना में अब भी
उसी वेदांतिक अग्नि की लौ है।

और जब भी कोई अन्याय के विरुद्ध स्वर उठाता है—
वह सिर्फ़ नागरिक नहीं बोलता,
अद्वैत बोलता है,
और वेदांत संविधान में पुनः जागता है।

Trishala

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