युद्ध और बुद्ध

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युद्ध कहीं भी हो मगर, हार रहा है बुद्ध
मिट्टी में गुड़िया पड़ी, टूटा पड़ा खिलौन।
किसने छीना बालपन, किसने बोए शोक॥
किसने बोए शोक, धुआँ नभ को निगलता,
ममता का हर फूल, बारूदों में जलता।
पूछ रही है धूल—कहाँ मानव का हृदय?

किसकी जय के हेतु, यह चलता रहता युद्ध?


युद्ध कहीं भी हो मगर, हार रहा है बुद्ध।
माँ ने खोला द्वार तो, लौटा नहीं कुमार,
चौखट पर बैठी रही, लेकर अश्रु-हार।
लेकर अश्रु-हार, नयन पथरा से जाते,
सूनी पड़ी रसोई, दीपक भी बुझ जाते।
किसको मिली विजय यहाँ, किसको मिला प्रबुद्ध?

एक चिता के सामने, छोटा पड़ता युद्ध।


युद्ध कहीं भी हो मगर, हार रहा है बुद्ध।
मानवता से खीझकर, धुआँ सूरज ढाँपे,
धरती की हर साँस भी, भय के मारे काँपे।
धर्मों के नाम पर, बढ़ता जाता क्रुद्ध,
मरता कोई धर्म नहीं—मरता मानव-बुद्ध।
मंदिर, मस्जिद, गिरजों में, किसका है यह युद्ध?

रक्त किसी का भी बहे, हार रहा है बुद्ध।
युद्ध कहीं भी हो मगर, हार रहा है बुद्ध।


युद्धों ने क्या दे दिया? राख, कब्र, संताप,
पीढ़ी-पीढ़ी ढो रही, हिंसा का अभिशाप।
हिंसा का अभिशाप, न सीमाओं में बँधता,
एक देश का घाव, जगत के मन को छेदता।
तेल, अन्न, व्यापार सब, होते हैं अवरुद्ध,
एक बम जहाँ गिरता, काँप उठता जग-बुद्ध।


युद्ध कहीं भी हो मगर, हार रहा है बुद्ध।
बोधिवृक्ष की छाँव से, आती मंद पुकार,
वैर कभी मिटता नहीं, बढ़ता प्रतिकार।
बढ़ता प्रतिकार, जगत को और जलाता,
करुणा का इक फूल ही, मानव मन महकाता।
बुद्ध कहें—हे मानव, सुन ले सत्य का शुद्ध,
तलवारों से जीत नहीं, प्रेम से जीते युद्ध।


युद्ध कहीं भी हो मगर, हार रहा है बुद्ध।
युद्ध कहीं भी हो मगर, हार रहा है बुद्ध।
जब तक मानव रक्त बहे—हार रहा है बुद्ध।

Trishala Mishra

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Sneha Khanwelkar
1 month ago

The poem is a deeply moving call for peace and love. The repeated line ‘युद्ध कहीं भी हो मगर, हार रहा है बुद्ध’ resonates like a tolling bell—urging us to see beyond borders and victories, to the universal truth that violence diminishes us all. Welcome to The Positive Diary, Trishala, with this dynamic poem. 🙂