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कविता : रुदन
वह पहला रुदन—
जो हवा को चीरता हुआ
माँ की छाती से लग जाता है,
किसी बीज की तरह
धरती में गिरकर
उम्मीद बन जाता है।
उस रोने में डर नहीं होता,
वह जीवन का ऐलान होता है—
“मैं आ गया हूँ…”
और कमरे में
दीये अपने आप जल उठते हैं।
माँ के आँसू हँसते हैं,
पिता की आँखों में
भविष्य उग आता है,
रुदन—
उत्सव का शंखनाद बन जाता है।
और वही रुदन—
वक़्त की लंबी यात्रा के बाद,
फिर लौटता है…
लेकिन अब
न किसी आगमन की खुशी है,
न किसी माँ की गोद।
अब यह रुदन
शब्दों से परे है,
यह प्रश्न है—
“क्यों?”
इस बार
रोने वाला कोई एक नहीं,
पूरा घर रोता है,
दीवारें गूंगी हो जाती हैं,
और समय
अपने पन्ने मोड़कर
चुपचाप खड़ा रह जाता है।
अजीब है रुदन—
जीवन के पहले पन्ने पर
आशीर्वाद,
और आख़िरी पन्ने पर
असह्य खालीपन।
एक ही ध्वनि,
पर अर्थ दो—
एक में सृजन का संगीत,
दूसरे में
हृदय के टूटने की आवाज़।
शायद इसलिए
जीवन हमें सिखाता है—
रोना कमज़ोरी नहीं,
यह उस प्रेम का माप है
जो हम
जन्म से मृत्यु तक
सहेजते चलते हैं।
त्रिशला मिश्रा ( मौलिक )